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Thursday, December 4, 2008

राजनीति प्रजा की सेवा के नाम पर धोखा है

आज भारत में राजनीति सेवा का साधन न रहकर एक व्यवसाय बन गयी है और व्यवसाय व्यक्ति अपने फायदे के लिये करता है समाजसेवा के लिये नहीं. आज राजनीतिबाज जो कर रहे हैं वह एक धोखा है जो प्रजातंत्र के नाम पर वह जनता को दे रहे हैं. 

यह शब्द 'राजनीति' ही सारे फसाद की जड़ है. भारत में प्रजातंत्र है, अब प्रजातंत्र में भला राजनीति का क्या काम? शब्दों में बहुत शक्ति होती है. शब्द अक्षर से बनते हैं और अक्षर ब्रह्म का एक रूप है. हम जो शब्द प्रयोग करते हैं वह हमारे सोच का प्रतिनिधित्व करता है और बाद में हमारे कर्मों को प्रभावित करता है. यह कहना कि 'मैं राजनीति में प्रजा की सेवा के लिए आया हूँ', एक धोखा है. राजनीति का अर्थ है वह नीतियाँ बनाना और पालन करना जो राज करने के लिए जरूरी हैं. प्रजा की सेवा के लिए जो नीतियाँ बनेंगी उनका एकमात्र उद्देश्य प्रजा की सेवा करना होगा. 

हमारे देश में प्रजा की सेवा के नाम पर राजतन्त्र चलाया जा रहा है. जनता जिन्हें अपना प्रतिनिधि चुनती है वह चुने जाने के बाद स्वयं को राजनेता घोषित कर देते हैं, और प्रजा पर शासन करने लगते हैं. कुछ राजनीतिबाजों ने तो परिवार का राज चला रखा है. अगर वह जन-प्रतिनिधि होते तो आज भारत का रूप दूसरा ही होता. कोई जन सेवा के लिए भ्रष्टाचार नहीं करेगा, कोई सेवा करने के लिए हिंसा करके चुनाव नहीं जीतेगा. सेवा एक से ज्यादा व्यक्ति एक साथ कर सकते हैं. राज एक ही व्यक्ति या एक दल या एक कोलिशन करता है. यह लोग अपनी जरूरतों के लिए इकठ्ठा होते हैं,जनता के दुखों से द्रवित होकर नहीं. हाँ यह बात अवश्य है कि ऐसा वह, जनता के लिए कर रहे हैं, कह कर करते हैं. यही वह धोखा है जो आज इस देश में राजनीतिबाज जनता को दे रहे हैं. 

'राजनीति' की जगह 'प्रजानीति' शब्द का प्रयोग किया जाना चाहिए. 'राजनेता' की जगह 'जन-प्रतिनिधि' का प्रयोग होना चाहिए. यह जन-प्रतिनिधि एक ट्रस्टी के रूप में काम करें, जैसे भरत ने राम का प्रतिनिधि बन कर अयोध्या का प्रबंध किया था. आज भारत को 'राम राज्य' नहीं 'भरत का प्रबंधन' चाहिए. आज देश को नेता नहीं ट्रस्टी चाहिए. आज जनता को शासक नहीं सेवक चाहिए. दशरथ के राज्य में अन्याय हुआ था, श्रवण कुमार की हत्या, राम को वनवास. राम के राज्य में भी अन्याय हुआ था, सीता को वनवास. पर भरत के प्रबंध में कोई अन्याय नहीं हुआ. यह इसलिए हुआ कि भरत राजा नहीं सेवक थे, राम के प्रतिनिधि थे. वह राम द्वारा मनोनीत अयोध्या के ट्रस्टी थे. 

Wednesday, November 26, 2008

लोकतंत्र का विकल्प

एक पत्रकार ने जैन संत आचार्य महाप्रज्ञ से पूछा - 'लोकतंत्र का विकल्प क्या हो सकता है?'
आचार्य ने उत्तर दिया - 'लोकतंत्र का विकल्प क्यों खोजते हो? शासनतंत्र की जितनी प्रणालियाँ हैं, उन में सबसे अच्छा विकल्प है लोकतंत्र. उस की श्रेष्टता अभी खंडित नहीं हुई है. फ़िर विकल्प की खोज किस लिए? विकल्प खोजना चाहिए लोकतंत्र को चलाने वाले हाथों का, जो हाथ लोकतंत्र की डोर थामने में काँप रहे हैं.' 

लोकतंत्र ने सत्ता को इतना गतिशील बनाया कि वह जाति, सम्प्रदाय, गरीबी, अमीरी - इन सबसे परे जाकर किसी भी योग्य व्यक्ति का वरण कर सकती है. यह लोकतंत्र के चरित्र का सबसे उजला पक्ष है, किंतु लोकतंत्र को चलाने वाले लोग अभी योग्यता की कोई कसौटी ही निश्चित नहीं कर पाये हैं. 

योग्यता की दो कसौटियां हो सकती हैं - चरित्र बल और बौद्धिक छमता. पता नहीं, क्यों लोकतंत्र के साथ अभी इन कसौटियों का मैत्री सम्बन्ध स्थापित नहीं हो रहा है. सत्ता और प्रशासन की कुर्सी पर आसन बिछाने वाले लोगों का अर्थ के प्रति घोर आकर्षण बता रहा है कि लोकतंत्र के सारथि का चरित्र-बल उन्नत नहीं है. अर्जुन को महाभारत की रणभूमि में सारथि मिल गया था. लोकतंत्र का अर्जुन अभी भी सारथि की खोज में है. महाभारत हो रहा है पर अर्जुन को सारथि नहीं मिल रहा है.   

(लोकतंत्र - नया व्यक्ति नया समाज से साभार)  

Saturday, November 8, 2008

मतदान

वह कहते हैं मतदान करो,
मन कहता है मत दान करो.

मतदान हमारी ड्यूटी है,
यह प्रजातंत्र की ब्यूटी है.

एक थैली के चट्टे-बट्टे,
भ्रष्टाचारी हट्टे-कट्टे.

कैसे इन को मतदान करुँ,
मन कहता है मत दान करुँ.