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Friday, August 1, 2008

क्या मनमोहन सिंह ने वोट डाला था?

आज एक पोस्ट पढ़ कर एक बात दिमाग में आई, शिवराज पाटिल, प्रफुल पटेल, मनमोहन सिंह को तो जनता ने नहीं चुना था, क्या इन्होनें लोक सभा में विश्वास मत पर वोट दिया था? यह सब लोक सभा के सदस्य नहीं हैं और मतदान लोक सभा में हुआ था. यह सरकार में मंत्री हैं, मनमोहन सिंह तो प्रधान मंत्री हैं, पर लोक सभा को इस सरकार पर विश्वास है क्या ऐसा वोट यह सब
दे सकते हैं?

क्या कोई ब्लागर इस बारे में जानकारी दे सकते हैं?

Wednesday, July 23, 2008

बेशर्मी के विश्व रिकार्ड्स

देख रही थी सारी दुनिया,
कपूत कर रहे थे शर्मिंदा मां को,
बना रहे थे रिकार्ड पर रिकार्ड,
बेईमानी, अनैतिकता, भ्रष्टाचार, अशुचिता के,
तालियाँ बज रही थीं, वाह-वाह हो रही थी,
अपमानित हो रही थी भारत मां,
अपने ही बेटों द्बारा.


राहुल गाँधी ने सुनाई कहानी एक कलावती की,
जिसका भविष्य सुरक्षित होगा परमाणु करार से,
खूब तालियाँ बजीं, चमचे चिल्लाये,
देश का भविष्य सुरक्षित है,
इस भावी प्रधानमंत्री के हाथों में,
पर कौन है यह कलावती?
बताया एक अखबार ने,
कलावती है एक गरीब विधवा,
सात बेटिओं और दो बेटों की मां,
उधार के भार से कर ली थी आत्महत्या उसके पति ने,
खेती करता था पर किसान नहीं था,
सरकारी परिभाषा ही कुछ ऐसी है,
इस लिए नहीं मिली उसे कोई सहायता,
न ही की उसकी सहायता राहुल गाँधी ने,
न राहुल की पार्टी ने,
न राहुल की पार्टी की आम आदमी की सरकार ने,
बस उसकी कहानी सुना दी,
वह भी अधूरी और निज स्वार्थसिद्धि के लिए.
कलावती की झोपड़ी में बिजली नहीं है,
उसके किराए के खेत में पम्प नहीं है,
क्या करेगी वह परमाणु बिजली का?
कब आएगी यह बिजली उसके गाँव में?
क्या वह जीवित रहेगी तब तक?
झोपड़ी की छत का हर हिस्सा टपकता है वारिश में,
दो वक्त की रोटी बहुत मुश्किल से जुटा पाती है,
यह सब नहीं बताया राहुल ने,
राहुल ने यह भी नहीं बताया,
कलावती ने दो दिन से कुछ नहीं खाया,
पर राहुल ने उसे रोटी नहीं भिजवाई,
बस कहानी सुना दी उसकी लोकसभा में,
राहुल की महानता और ज्यादा महान हो गई.


जो वोटिंग से गायब हो गए,
या जिन्होनें करार के ख़िलाफ़ वोट डाला,
ya जिन्होनें करार के पक्ष में वोट डाला,
क्या उन्होंने परमाणु करार का मसौदा पढ़ा है?
क्या वह उसे समझ पाये हैं?

मौका है, बदल डालो कानून,
सब प्रधानमन्त्री बनना चाहते हैं,
'एमपी' को कर दो 'पीएम',
हो सकते हैं प्रधानमन्त्री एक नहीं एक हज़ार,
लड़ कर खा रहे हैं देश को,
मिल जुल कर खाएं,
जो जीते चुनाव कहलाये पीएम.

सोमनाथ दा ने बनाया रिकार्ड,
बहस के दौरान मुस्कुराते रहने का,
बार बार देखते थे इलेक्ट्रोनिक बोर्ड को,
मंद-मंद मुस्कुराते थे,
डांटते थे सदस्यों को मुस्कुराते हुए,
कहते थे अपनी सीट पर जाओ, मुस्कुराते हुए,
लगता है, विश्वास मत की जीत पर,
सबसे ज्यादा खुशी हुई सोमनाथ दा को.

मनमोहन जी ने विश्वास मत हासिल किया,
पर ज्यादा वधाइयां मिलीं सोनिया जी को,
कुछ देर खरे रहे वह अकेले,
फ़िर बढ़ गए दरवाजे की तरफ़,
किसी ने नहीं देखा उनका जाना,
जीत में अकेलापन,
कैसा लगा होगा यह अनुभव.

Monday, July 21, 2008

जीते कोई भी, आम आदमी तो हार गया पहले ही

केन्द्र सरकार द्बारा विश्वासमत प्रस्ताव पर २२ जुलाई को मतदान होगा. इस में कौन जीतेगा और कौन हारेगा यह तो समय बतायेगा, पर आम आदमी तो प्रस्ताव रखने से पहले ही हार गया. और उस के साथ हार गई, ईमानदारी, व्यवहार में शुचिता और नैतिकता. आज़ादी के बाद प्रजातंत्र पर यह सबसे बड़ा आघात है. यह आघात उन लोगों द्बारा किया गया है जिन्हें जनता ने प्रजातंत्र के रखवालों के रूप में अपना प्रतिनिधि चुना था. जनता ने जिनमें अपना विश्वास प्रकट किया था कि वह ईमानदारी, व्यवहार में शुचिता और नैतिकता के आदर्श स्थापित करेंगे. आज उन्हीं लोगों ने जनता के साथ अभूतपूर्व विश्वासघात किया है. सबने ख़ुद को जनता के विश्वास के अयोग्य साबित कर दिया है. कोई फर्क नहीं है किसी में. बस लेबल अलग हैं. मेरे पास उन्हें कहने को बस इतना ही है - डूब मरो चुल्लू भर पानी में अगर कुछ भी इंसानियत तुममें बाकी है.