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Saturday, June 21, 2008

नेताजी वोट मांगने आये

नेता जी बोले, "मुझे वोट दीजिये".
मैंने कहा, "क्यों?".
" हम आपका प्रतिनिधित्व करेंगे", उन्होंने समझाया.
मैंने कहा, "क्यों?".
"क्या मतलब?, मेरी समझ में नहीं आया", वह बोले.
मैंने कहा, "क्यों?".
"अरे आप हर बात का जवाब क्यों में क्यों देते हैं?", उन्होंने पूछा.
"क्योंकि आप बात ही ऐसी करते हैं", मैंने कहा.
"क्यों, क्या ग़लत बात कह दी मैंने?", नेताजी बुरा मानते हुए बोले.
"आपने कोई ग़लत बात नहीं कही. आपने वही कहा जो सारे नेता कहते हैं", मैंने कहा.
"तो फ़िर क्यों, क्यों की रट क्यों लगा रखी है आपने?", नेताजी फ़िर बुरा मानते हुए बोले.
अब बात की गेंद फ़िर मेरे पाले में थी. मुझे लगा कि इस बार बात सिर्फ़ क्यों कहने से नहीं टलेगी. विस्तार में जवाब देना होगा. नेताजी इतनी आसानी से टलने वाले नहीं लगते.
मैंने कहा, "पहले आप बैठिये".
"लीजिये बैठ गया", उन्होंने कहा.
"अब मेरी बात ध्यान से सुनिए", मैंने कहा, "आपने मुझे वोट देने को कहा, मैंने पूछा कि मैं आपको क्यों वोट दूँ, आपने कहा आप मेरा प्रतिनिधित्व करेंगे, मैंने कहा आप मेरा प्रतिनिधित्व क्यों करेंगे, फ़िर आपने कहा कि आप नहीं समझे, मैंने पूछा क्यों नहीं समझे, कृपया बताइये कि अब तो आप समझ गए ना?".
"क्या मैं एक ग्लास पानी पी सकता हूँ?", उन्होंने परेशानी से कहा.
मैंने उन्हें एक ग्लास पानी दिया. उन्होंने पानी पिया, रुमाल से माथा पोंछा और बोले, "अच्छा अब में चलता हूँ".
"अरे आप तो इतनी जल्दी घबरा गए, मैं तो आपसे एक घंटा बात करना चाहता था", मैंने कहा.
"नहीं आज के लिए इतना काफ़ी है, पिछले तीन चुनावों में किसी ने ऐसे सवाल नहीं पूछे, हम कहते थे हमें वोट दीजिये और लोग कहते थे जरूर देंगे, पर अब तो लगता है लोग बदल गए हैं", बोलते-बोलते वह उठे और तेजी से निकल गए.
"यह क्या किया आपने?", मेरी पत्नी ने पूछा, "किसी न किसी को तो वोट देंगे ही, कह देते आपको देंगे, बेचारे खुश हो जाते".
"नहीं, मैं उन्हें खुश नहीं करना चाहता, मैं उन्हें चिंतित करना चाहता हूँ, मैं उन्हें यह एहसास दिलाना चाहता हूँ कि वोट अब इतनी आसानी से नहीं मिलेगा, कुछ काम करना होगा उस के लिए", मैंने पत्नी को समझाया.
"आप की बातें आप ही जानो, मैं रसोई में जाती हूँ, बहुत काम पड़ा है", और वह भी चल दीं.
मैं सोचता रहा. मुझे लगा इस बार चुनाव की शुरुआत अच्छी हुई है.