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Thursday, October 30, 2008

आप क्या सोचते हैं?

हमारा देश भारत एक प्रजातंत्र है. प्रजातंत्र दो शब्दों से बना है, प्रजा और तंत्र. प्रजा क्या है यह आप जानते है, आप ख़ुद ही प्रजा हैं. तंत्र क्या है, यह भी आप जानते हैं, आखिरकार पिछले ६० वर्षों से अधिक समय से आप इस तंत्र को झेल रहे हैं. हम सब को बचपन में यह बताया गया था कि प्रजातंत्र में जनता का तंत्र (सरकार) होता है. आज भी बच्चों को यही बताया जाता है. पर आपका अनुभव क्या है? क्या भारत में जनता का तंत्र है? क्या आप कह सकते हैं कि भारत में जनता की सरकार है या रही है

एक और शब्द जो बहुत अधिक प्रयोग किया जाता है वह है राजनीति, यानि राज करने की नीति. राज करने की बात करना प्रजातंत्र की मूल भावना के बिल्कुल ख़िलाफ़ है, पर हर व्यक्ति इस शब्द का प्रयोग करता है - प्रजा भी और प्रजा पर तंत्र चलाने वाले भी. अक्सर आपको बहुत से प्रजाजन यह कहते  मिल जायेंगे कि अमुक प्रदेश में या केन्द्र में अमुक राजनितिक दल का राज्य है, तंत्र है. राज्य और तंत्र, दोनों को मिला दीजिये, बना राजतन्त्र. यानी हमारे देश में प्रजातंत्र के नाम पर राजतंत्र है. चुनाव के माध्यम से प्रजा अपने प्रतिनिधि चुनती है, पर यह प्रतिनिधि प्रजा का प्रतिनिधित्व करने के स्थान पर प्रजा पर राजतन्त्र चलाते हैं. उसपर मनचाहा अत्त्याचार करते हैं. 

घोषित राजतन्त्र और अघोषित राजतंत्र (प्रजातंत्र) में कुछ अन्तर भी हैं. राजतंत्र में जितनी आसानी से प्रजा अपने राजा से मिल सकती थी, प्रजातंत्र में प्रजा उतनी आसानी से अपने प्रतिनिधियों से नहीं मिल पाती. राजतन्त्र में पता रहता था कि वर्तमान राजा के बाद कौन राजा बनेगा, पर प्रजातंत्र में यह पता नहीं होता कि प्रजा का अगला प्रतिनिधि कौन होगा. हालांकि कुछ लोग अपने परिवार के लोगों को देश पर लादते रहे हैं और अभी भी यह लादना चल रहा है. प्रजातंत्र में किसी को युवराज कहा जाना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि यह लोग प्रजातंत्र के नाम पर राजतंत्र चला रहे हैं. इसमें एक बिल्कुल अपरिचित व्यक्ति भी प्रजा का प्रतिनिधि चुना जा सकता है और उस पर राज कर सकता है. 

मैंने ऊपर चुनाव की बात कही. चुनाव का अर्थ यह लोग क्या लगाते हैं जरा देखिये? कोई कहता है मैं चुनाव लड़ रहा हूँ. कोई कहता है मैं चुनाव में खड़ा हूँ. कोई यह नहीं कहता कि मैंने प्रजा के समक्ष उनका प्रतिनिधित्व करने का प्रस्ताव रखा है. अगर प्रजा मेरे प्रस्ताव को स्वीकार करेगी तो मैं अगले पाँच वर्षों के लिए लोकसभा या विधान सभा में प्रजा का प्रतिनिधित्व करूंगा. अगर एक से अधिक प्रस्तावक हैं तो चुनाव की प्रक्रिया द्बारा प्रजा अपना प्रतिनिधि चुनेगी. पर यह लोग चुनाव को लड़ाई मानते हैं इस लिए चुनाव में हिंसा होती है. अब कोई सेवा करने के लिए तो हिंसा नहीं करेगा. हिंसा तो तभी करेंगे जब इन के मन में सत्ता की भावना होगी. यानी, आज के प्रजातंत्र में सेवा की नहीं सत्ता की नीति चल रही है, इस लिए शब्द 'राजनीति' प्रयोग किया जा रहा है 'प्रजानीति' नहीं. राजनीति यानि राज्य करने की नीति. अगर मन में प्रजा की सेवा करने की भावना होती तो शब्द प्रजानीति प्रयोग करते. 

कुछ प्रदेशों में चुनाव की घोषणा हो गई है. अगले वर्ष लोक सभा के चुनाव भी होंगे. भारतीय मतदाताओं के लिए यह एक अवसर हे यह मुद्दे उठाने का, और इन राजनीतिबाजों से जवाब मांगने का. इस बार वोट देने से पहले कुछ बातें स्पष्ट कर लेना जरूरी है. आप क्या सोचते हैं इस बारे में?