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Sunday, August 3, 2008

कुछ टिप्पणियाँ जों कवितायें बन गई

शीला दीक्षित ने कहा,
कहाँ है मंहगाई?
मुझे तो आज तक मिलने नहीं आई,
न ही किसी नागरिक ने फोन किया,
कि शहर में मंहगाई है आई,
चुनाव आए तो बहकाने लगे जनता को,
इन लोगों को शर्म भी नहीं आई.

राजनीति में चांदी के जूते नहीं मारे जाते सबको,
अधिकाँश को तो मारे जाते हैं प्रजातंत्र के जूते,
वह भी भिगोकर पानी में,
और उनकी आवाज भी नहीं होती,
मारने वाला राजनेता,
मार खाने वाला आम आदमी,
वह जूते मारें और तुम खाए जाओ,
यह गीता का ज्ञान नहीं है,
गीता कहती है संघर्ष करो,
अन्याय के ख़िलाफ़, जुल्म के ख़िलाफ़,
एहसानफ़रामोशी, विश्वासघात के ख़िलाफ़,
कर्म करो, वह फल देगा, उसका वादा है यह,
पर तुम कर्म तो करो.

छोटो-मोटी चोरी छोड़ो नेता बन जाओ,
एक वोट डालोगे तीन करोड़ मिलेंगे,
मान्यवर कहलाओगे अलग से,
अगर सबको पता भी चल गया तो क्या होगा?
लोक सभा में रिश्वत लेना अपराध नहीं है,
आज पुलिस डंडे मारती है,
कल सलाम करेगी नेता जी को,
आज टू व्हीलर चुराते हो,
कल आगे पीछे होंगी फोर व्हीलर,
भइया मौका है हाथ से मत जाने दो,
जल्दी चुनाव होंगे,
करो एक दो मर्डर,
ले लो एंट्री पोलिटिक्स में.

सरकार जीत गई है विश्वास मत,
एटमी करार लाएगा विजली,
हर घर में, हर गाँव, हर शहर में,
शीला दीक्षित भी खुश,
बिना विजली के परेशान दिल्ली के निवासी भी खुश,
राहुल गाँधी भी खुश,
कलावती भी खुश,
मनमोहन खुश कुर्सी बच गई,
अमर सिंह खुश मुक़दमे वापस,
सोरेन खुश कुर्सी मिल गई,
कितने सारे खुश बन गए करोड़पति,
देश प्रगति के रास्ते पर अग्रसर है,
सब खुश हैं, तुम क्यों नाखुश हो,
सब आगे जा रहे हैं, तुम घिसट रहे हो,
बेबकूफ कहीं के.