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Wednesday, December 10, 2008

कौन जीता - नेता या जनता?

भारत में जो लोकतंत्र है, उसमें नेता सब से ऊंचा होता है. हारने वाले नेता कहते हैं, "जनता जनार्दन का जनादेश सिरोधार्य". जीते हुए नेता अगर बहुत मेहरबान हुए तो जनता का धन्यवाद कर देते हैं और चल पड़ते हैं अपना और अपनों का घर भरने के लिए. चुनाव के बाद जो भी कहा जाता है वह सब शब्दों का हेर फेर होता है, इस में वास्तविकता न के बराबर होती है. 

जनता चुनाव में वोट डालती है, पर नेताओं के लिए, अपने लिए नहीं. जनता के वोट से नेता जीतते हैं, जनता नहीं. नेता का नाम और लेबल अलग-अलग हो सकता है, पर जीतता नेता ही है, या यह नेता या वह नेता, जनता कभी नहीं जीतती. चुनाव एक माध्यम है नेता जी को अपनी सत्ता प्राप्त करने का. उस के लिए वह जनता का प्रयोग करते हैं, कि भाई आओ और वोट डालो, बताओ किस से शासित होना पसंद करोगे आने वाले पॉँच साल के लिए? जनता जाती है और पाँच साल के लिए अपने शासक के नाम का बटन दबा आती है. जो जीत जाता है, जम कर शासन करता है. जनता की ऐसी-तैसी कर देता है. जनता मन ही मन सोचती रहती है कि देख लेंगे अगले चुनाव में. फ़िर चुनाव होता है. फ़िर जनता बटन दबा आती है किसी नेता के नाम पर, और पाँच साल के लिए फ़िर गुलाम हो जाती है. शासक का नाम और लेबल हो सकता है बदल जाए, पर शासक और गुलाम का रिश्ता बैसा ही रहता है. 

इस बार भी नेता ही जीते हैं. जनता फ़िर हारी है. मजे की बात यह है कि हारने के लिए जनता सुबह उठ कर हमेशा की तरह मतदान केन्द्र पर गई और अपनी हार मशीन में बटन दबा कर बंद कर आई. अब गुलामी का नया पाँच साल का दौर फ़िर शुरू.