सरकार का यह कहना कि अन्ना ने कहा कि 'केवल मेरा बिल, कोई दूसरा बिल नहीं', सरासर झूठ है. अन्ना ने सिर्फ यह कहा कि जन लोकपाल बिल को भी संसद में विचार के लिए लाया जाए. सरकार को शर्म आनी चाहिए.
मैंने पहले ही कहा था कि अन्ना का अनशन एक अनिश्चित कालीन अनशन है, आमरण अनशन नहीं. सरकार भ्रामक प्रचार कर रही है. सरकार को शर्म आनी चाहिए.
जब भारत आजाद हुआ तब न कोई संसद थी और न कोई सांसद, और न ही कोई संविधान. अगर कोई था तब सिर्फ भारत की जनता. इस जनता ने संविधान बनाया, संसद बनाई, सांसद बनाए. पर इन कपूत सांसदों ने जनता को ही बाहर का कह दिया.
कपिल चिद्दू - संसद जिंदाबाद, सांसद जिंदाबाद, जनता मुर्दाबाद.
सांसद-सांसद भाई-भाई, बीच में यह जनता कहाँ से आई?
जनता को अधिकार है कि वह संसद को बदल दे, पर संसद के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं है जिस से वह जनता को बदल सके. कौन बड़ा हुआ?
जनता ने कभी संसद के अधिकार को चनौती नहीं दी, पर मनमोहन लगातार जनता के अधिकारों को चुनौती दे रहे हैं.
जनता ने संसद को बनाया या संसद ने जनता को बनाया? मनमोहन की सरकार पहले आई या देश की जनता पहले आई?
जनता ने संसद की स्रष्टि की, सांसद चुन कर वहां भेजे, पर इन कपूतों ने पिता को ही बाहर का कह दिया.
कांग्रेस पार्टी और सरकार अहंकार का शिकार हो गई है. जिस जनता ने इसे सत्ता में पहुँचाया, उसी जनता का आज संसद में इस के मंत्रियों ने अपमान किया. कपिल सिबल ने तो अन्ना, एक नागरिक, को बाहर का आदमी कह दिया. यह अहंकार कांग्रेस को ले डूबेगा.
क्या सरकार अंधी है और बहरी है? सारे देश में हजारों-लाखों लोग सड़क पर उतर आये हैं. सरकार उनकी बात न सुन पा ही और न ही समझ रही है. कानून की पेचीदगियां समझा रही है सरकार.
मनमोहन सिंह वकीलों के चक्कर में पड़ गए हैं और राजनितिक मुद्दों को पुलिस द्वारा सुलझवाने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं.
कभी मैं सोचता हूँ कि ऐसा क्या है जिस के कारण कपिल सिबल उस मंत्रिमंडल का सदस्य है जिस के मुखिया मनमोहन सिंह हैं. ऐसे ही मनीष तिवारी उस कांग्रेस का प्रवक्ता है जिस की अध्यक्ष सोनिया गाँधी हैं. क्या भ्रष्टाचार वह कड़ी है?
अब किसी के मन में कोई संदेह नहीं रहना चाहिए कि यह सरकार भ्रष्टाचार की नींव पर खड़ी है. अगर भ्रष्टाचार को एक वृक्ष के रूप में देखा जाए तब यह सरकार कैसे उसी डाली को काट दे जिस पर बैठी है? अन्ना का जन लोकपाल अगर कानून बन गया तब इस सरकार के अधिकाँश मंत्री और बाबू जेल में नजर आयेंगे.
कांग्रेस का सोच अंग्रेजी सरकार के सोच की विरासत है. 'तोड़ो और राज्य करो', यही कांग्रेस का मूलमंत्र रहा है. संसद और जनता के बीच वह एक गहरी खाई बना रही है. मेरे विचार में यह एक प्रकार का देशद्रोह है. जनता और संसद एक दूसरे से अलग नहीं हैं. संसद बनती है और उसे जनता बनाती है अपने प्रतिनिधि वहां भेज कर. लेकिन अफ़सोस, ज्यादातर प्रतिनिधि गद्दार बन जाते हैं और जिस जनता ने उन्हें भेजा है उसी जनता को बाहर के आदमी कहने लगते हैं.
आज सारे दिन कांग्रेस सदन में विपक्षी पार्टियों को अन्ना के विरुद्ध भड़काती रही. अभी भी भड़का रही है. सदन सर्वोच्च है, सांसद ही केवल कानून बना सकते हैं, अन्ना बाहर का आदमी है, उसे सबक सिखाना है, सारी पार्टियाँ सरकार के साथ आ कर एक स्वर में अन्ना जैसे बाहरी लोगों को उनकी सही जगह दिखाएँ.
क्या जनता ने वोट दे कर अपने सारे अधिकार सरकार के पास गिरवी रख दिए हैं? क्या अब उसे यह भी अधिकार नहीं रहा कि वह यह कह सके कि कौन सा कानून बनाया जाय और कैसा बनाया जाए? कोई संसद की अवमानना नहीं कर रहा. सच्चाई तो यह है कि बार-बार संसद को इस में घसीट कर सरकार संसद की अवमानना कर रही है.
मैं ऐसा नहीं मानता कि कानून बनाने का अधिकार सिर्फ संसद को है. अगर सिर्फ संसद को है तब जो बिल संसद में पेश किया गया है वह तो एक सरकारी विभाग ने बनाया था. मंत्रिमंडल ने उस पर सरकारी मुहर लगा दी थी. उस के बाद यह बिल संसद में आया. ऐसे ही एनसी है, क्या उस के बनाए बिल सरकार नहीं मानती? अन्ना के बिल से क्यों तकलीफ हो रही है?
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