पिछले दिनों अपनी तनख्वाह खुद बढाने के लिए जन-प्रतिनिधियों ने लोक सभा में जो अशोभनीय व्यवहार किया उस से भारतीय संसद और प्रजातंत्र का सिर शर्म से झुक गया. ऐसा नहीं है कि ऐसा अशोभनीय व्यवहार उन्होंने पहली बार किया है, बस फर्क इतना है कि इस बार वह बहुत नीचे गिर गए. एक तो यह ही अनेतिक था कि कोई अपनी तनख्वाह बढ़ाने का निर्णय खुद ही ले. दूसरे नकली संसद का खेल खेल कर उन्होंने संसदीय परम्पराओं का उपहास किया.यह सांसद जिस छेत्र से चुन कर आये हैं, वहां के मतदाता कितना शर्मिंदा महसूस कर रहे होंगे, क्या यह ख्याल भी इन के मन में आया होगा. मतदाताओं को आज यह निर्णय कर लेना चाहिए कि इन सांसदों को दुबारा चुनने की गलती अब वह नहीं करेंगे.
साथ के चित्र पर क्लिक करें. यह महिला विहान सभा की सदस्य हैं. अपनी बात कहने का यह कैसा तरीका है?
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